Nightfall(Swapandosh) Rokne ke Aasan Ayurvedic Upay

Nightfall(Swapandosh) Rokne ke Aasan Ayurvedic Upay

स्वप्नदोष(Nightfall)-

युवावस्था के जब लक्षण फूटने प्रारम्भ हो जाते हैं, अधिकांशत: उस समय यह रोग होता देखा जाता है। चिकित्सा के लिए जाने वाले युवा लड़के अधिकतर 22-24 वर्ष की आयु में आते हैं, जबकि इस रोग के लक्षण 14-15 वर्ष की आयु में ही प्रारम्भ हो जाते हैं। इस रोग की शुरूआत हो जाने का अर्थ है पुरूष के अंदर पुरूषोचित गुणों का विकास हो चुका है। जननेन्द्रियों ने अपना कार्य प्रारम्भ कर दिया है। जब वीर्य उत्पादक अंग हरकत में आने लगते हैं, तभी यह रोग प्रकट होने लगता है। लड़कों के अंदर जब पुरूषोचित भाव जागृत हो जाता है, तब स्वप्नदोष होने लगता है। संसार का कोई भी ऐसा पुरूष नहीं है, जिसको एक-आध बार स्वप्नदोष न होता हो। कई रोगी ऐसे भी होते हैं, जिनका वीर्य नहीं निकलता।
स्वप्नदोष इसलिए होता है, क्योंकि रोगी सोता-सोता स्वप्न में मैथुन करता है। जैसे ही वीर्यपात होता है, नींद खुल जाती है। यह एक प्रकार का मानसिक रोग है, जिसका संबंध मस्तिष्क से है। स्वप्नदोष कभी-कभार हो जाना कोई रोग नहीं है। लेकिन अत्यधिक स्वप्नदोष उसी रोगी को होता है, जो रात-दिन स्त्रियों के रूप, सौंदर्य तथा काम अंगों की कल्पना में खोये रहते हैं। जिन युवकों का ध्यान इस ओर नहीं होता, वे स्वप्नदोष के दोष से बचे रहते हैं। अत्यधिक स्वप्नदोष से रोगी दुबला-पतला, कृशकाय, चिड़चिड़ा हो जाता है इस रोग को स्वप्नप्रमेह भी कहा जाता है।

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स्वप्नदोष के प्रमुख कारण-

Nightfall(Swapandosh) Rokne ke Aasan Ayurvedic Upay

स्वप्नदोष के प्रमुख कारणों पर नीचे सविस्तार प्रकाश डाला जा रहा है। प्रमुख कारण निम्नांकित है-

1. रातदिन स्त्रियों के रूप-सौंदर्य का ध्यान करते रहना।

2. विषय-भोग का अधिक चिंतन करना।

3. हस्तमैथुन कर वीर्य नाश करते रहना।

4. अत्यधिक पौष्टिक आहार करना।

5. दिनभर निकम्मे बैठ रहना।

6. अश्लील फिल्में देखना।

7. अश्लील गंदा साहित्य पढ़ना।

8. रतिक्रीड़ा करते हुए जोड़ों को चोरी-छिपे देखना।

9. अश्लील चित्र देखना।

10. अधिकांश समय एकांत में रहना।

11. दोस्तों के साथ अधिकांश समय तक स्त्री सौन्दर्य की चर्चा करना।

12. एक से अधिक स्त्रियों के साथ मैथुन करना।

13. वेश्याओं की संगत में रहना।

14. अधिकांश समय तक स्त्रियों के मध्य समय बिताना।

15. अस्वाभाविक-अप्राकृतिक मैथुन करना।

16. गर्म-उत्तेजक पदार्थ अधिक खाना।

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17. कब्ज़ का बना रहना।

18. खाया-पीया शरीर को ना लगना।

19. अत्यधिक मानसिक श्रम करना।

20. एक ही स्थान पर काफी देर-देर तक बैठे-बैठे कार्य करना।

21. चिंता-तनाव में लिप्त रहना।

22. चटपटा मिर्च मसालेदार खाद्य-पेय खाते-पीते रहना।

स्वप्नदोष के प्रमुख लक्षण-

स्वप्नदोष के प्रमुख लक्षण नीचे सविस्तार प्रस्तुत किये जा रहे हैं। प्रमुख लक्षण निम्नांकित हैं-
1. रोगी कमजोर कृशकाय हो जाता है।

2. चेहरे की कांति नष्ट हो जाती है।

3. रोगी की स्मरणशक्ति घट जाती है।

4. रोगी की आंखें धंस जाती है।

5. रोगी का सिर भारी रहता है।

6. अक्सर सिरदर्द की शिकायत रहती है।

7. रोगी मानसिक विकारों से ग्रस्त रहता है।

8. रोगी शीघ्रपतन का शिकार हो जाता है।

9. रोगी के मूत्र के साथ भी वीर्य आने लगता है।

10. स्वप्नदोष का उचित उपचार न किया जाये तो आगे चलकर रोगी प्रमेह रोग से पीड़ित हो जाता है।

11. रोगी मानसिक तनावग्रस्त रहता है।

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12. शरीर कई रोगों का घर बन जाता है।

13. रोगी का मस्तिष्क निर्बल हो जाता है।

14. रोगी डर-भय का शिकार रहने लगता है।

15. थोड़ा-सा परिश्रम करते ही रोगी हांफने लगता है।

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स्वप्नदोष की उपयोगी सहायक चिकित्सा-

पुरूषत्वहीन पुरूष स्त्री की ओर उतना अधिक आकर्षित नहीं होता, जितना कि पुरूषोचित गुण सम्पन्न पुरूष आकर्षित होता है। पौरूष शक्ति से लबालब भरा व्यक्ति निश्चय ही स्त्री की ओर आकर्षित होगा, उसको रोका नहीं जा सकता। यह प्रकृति का विधान है। युवा होते ही विपरीत सेक्स एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं। स्त्री-पुरूष की ओर तथा पुरूष स्त्री की ओर। जानवरों में नर और मादा एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते है। युवा होने के पश्चात् यौन भावनाओं की पूर्ति नहीं होती, इसलिए स्वप्नदोष के रूप में यौन भावनायें उछाल मारती हैं। माह में 1-2 बार यदि स्वप्नदोष होता भी है, तो यह कोई विशेष चिंता की बात नहीं है। परन्तु यदि निरन्तर स्वप्नदोष हो रहा हो तो चिंता की आवश्यकता है।
अधिक स्वप्नदोष दुर्बलता-कमजोरी उत्पन्न करता है। नीचे पाठकों की जानकारी लिए सहायक चिकित्सा हेतु कुछ तथ्य लिखे जा रहे हैं, जो इस प्रकार है-

1. रोगी को सांत्वना दें।

2. रोगी को डर-भय रहित रखें।

3. रोगी के मन से विषय वासनाओं कुविचारों तथा बुरे व्यसनों को निकाल बाहर करने का प्रयास करें। रोगी को आवश्यक निर्देश दें।

4. रोगी के पास यदि अश्लील चित्र, अश्लील किताबें अथवा अन्य किसी प्रकार की वस्तु हो तो अभिभावकों की मदद से वह सब ले लेना चाहिए। इसके लिए रोगी के साथ किसी प्रकार का विवाद नहीं करना चाहिए।

5. रोगी यदि अश्लील सिनेमा, ब्लू फिल्म आदि देखने की आदत पाले हुए हो तो उसको इस आदत से बाज आने का निर्देश दें।

6. रोगी की विचारधारा में परिवर्तन लाने का प्रयास करें। विशेष करके रोगी के अंदर धार्मिक भावना भरने की कोशिश करनी चाहिए।
(क.) धार्मिक किताबें पढ़ने को दें।
(ख.) पुराण आदि पढ़ने को दें।
(ग.) सात्विक पदार्थों को कदापि सेवन न करने दें।

7. उत्तेजक पदार्थों को कदापि सेवन न करने दें।

8. रोगी को सुबह-शाम खुले हवादार वातावरण में टहलने जाने का परामर्श दें।

9. रात को सोने से पूर्व हाथ-पांव तथा सिर धोने की सलाह दें।

10. सुबह-शाम रोगी को ठंडे शीतल जल से स्नान करने का परामर्श दें।

11. रोगी को एकांत में कदापि न रहने दें।

12. अकेले कमरे में सोने भी नहीं देना चाहिए।

13. रोगी के साथ हर वक्त किसी न किसी को रहने की सलाह दें।

14. रोगी का कमरा साफ-सुथरा हवादार रहना चाहिए।

15. रोगी के कमरे में किसी भी प्रकार के अश्लील चित्र, कामोत्तेजक स्त्रियों व किसी फिल्मी अभिनेत्री के चित्र नहीं होने चाहिए। यदि हो तो उनको तुरन्त उतार देना चाहिए।

16. रोगी के साथ अश्लील बातें करने वाले दोस्तों तथा सगे-संबंधियों के मिलने-जुलने पर प्रतिबंध लगा दें।

17. रोगी के साथ सात्विक विषय पर चर्चा की अनुमति दें।
(क.) सामाजिक विषयों पर बातचीत की अनुमति दें।
(ख.) धार्मिक विषयों पर बातचीत की अनुमति दें।
(ग.) सांस्कृतिक विषयों पर बातचीत की अनुमति दें।
(घ.) आर्थिक या राजनैतिक विषयों पर भी बातचीत की जा सकती है।

18. रोगी को खामोश, गुमसुम कदापि न रहने दें।

19. रोगी को हीनभावना का शिकार न होने दें।

20. रोगी को प्रसन्नचित रखें।

21. रोगी को निर्देश दें कि वह जब भी सोने को जाये, सोने से पूर्व एक बार मूत्र अवश्य त्याग कर लें।

22. रोगी को निर्देश दें कि वह जब भी मूत्र त्याग करे, एक बार अण्डकोष सहित शिश्न को ठंडे शीतल जल से अवश्य धो लें।

23. रोगी को ‘सादा जीवन उच्च विचार’ की प्ररेणा दें।

24. रोगी किसी भी प्रकार का अश्लली नाटक नृत्य आदि न देखने पाये।

25. लगातार निगरानी में रहने पर हस्तमैथुन की आदत छूट जाती है।

26. रोगी को चिंता तनाव से मुक्त रखें।

27. रात को सोते समय अत्यधिक पानी नहीं पीना चाहिए।

28. अत्यधिक मिर्च-मसाले वाले आहार ना खायें।

29. पेट के बल रोगी को न सोने दें।

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